आदिवासी गांव का पहला इंजीनियर

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जिनके हौसलें बुलंद होते हैं, कोई मुश्किल उनका रास्ता नहीं रोक पाती। अपनी मेहनत के बल पर ऐसे लोग आखिरकार मंज़िल पा ही लेते हैं। कुछ ऐसा ही किया है, राजस्थान के एक आदिवासी मज़दूर के बेटे ने। अपनी मेहनत और लगन के बल पर अब वह गांव का पहला इंजीनियर बनने जा रहा है।

इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाला पहला लड़का

इंजीनियरिंग और मेडकिल की पढ़ाई में आमतौर पर बहुत पैसे खर्च होते हैं, इसलिये गरीब बच्चे इस फील्ड से दूर ही रहते हैं, लेकिन राजस्थान के झालावड़ जिले के मोगायबीन भीलन गांव के मज़दूर के बेटे ने ऐसा कारनामा कर दिखाया है, जिससे हर कोई हैरान हो रहा है। इस गांव के 18 साल के लेखराज भील ने जेईई-मेन परीक्षा पास कर ली है, उसे 10740 रैंक मिली है। लेखराज भीलन गांव से इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाला पहला लड़का होगा। लेखराज के माता-पिता दोनों ही अनपढ़ है और मनरेगा मज़दूर है।

नहीं पता क्या होता है इंजीनियर?

लेखराज की उपलब्धि इसलिये भी बहुत मायने रखती है क्योंकि वह ऐसे परिवार से हैं, जहां उसके पिता को यह तक नहीं पता कि आखिर इंजीनियर होता क्या है। बेटा भील समुदाय का पहला इंजीनियर बनने जा रहा है। इस बात से जाहिर है लेखराज के पिता बहुत खुश हैं क्योंकि उन्होंने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि उनका बेटा ग्रेज्युएट बन पायेगा।

आदिवासी गांव का पहला इंजीनियर
मेहनत का फल मीठा होता है  | इमेज :फाइल इमेज

दरअसल, लेखराज बचपन से ही पढ़ने में बहुत तेज़ है, लेकिन पिछड़े इलाके में रहने के कारण उसे कभी साइंस और मैथ्स के अच्छे टीचर नहीं मिल पाये, बावजूद इसके लेखराज ने खुद ही तैयारी की और दसवीं में 93.83 प्रतिशत लाकर झालावड़ जिले में टॉप किया था।

शिक्षकों ने की मदद

लेखराज की बुद्धिमानी को देखकर स्कूल के टीचर्स ने उसके माता-पिता को उसे कोटा कोचिंग इंस्टीट्यूट भेजने को कहा ताकि वह इंजीनियरिंग और मेडिकल एंट्रेस की तैयारी कर सके। लेखराज के माता-पिता के पास इसके लिये पैसे नहीं थे, तो उन्होंने मना कर दिया। बाद में स्कूल के कुछ टीचर लेखराज को कोटा ले गये और वहां उसे फ्री में कोचिंग करवाई। सिर्फ चार महीने की कोचिंग के बाद ही लेखराज ने इंजीनियरिंग का एंट्रेस एग्ज़ाम पास कर लिया।

बच्चों की मदद

लेखराज का कहना है कि वह अपनी पढ़ाई खत्म करने के बाद माता-पिता के साथ ही गांव के बच्चों की भी मदद करेगा और पढ़ाई की अहमियत को लेकर लोगों को जागरुक करेगा, क्योंकि उसके गांव में अधिकांश बच्चे अनपढ़ और मज़दूरी करते हैं।

लेखराज जैसे बच्चों की सफलता से एक बात साबित हो जाती है कि अभाव और मुश्किलें भी हुनरमंद लोगों का रास्ता नहीं रोक सकती।

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