इला रमेश भट्ट ने महिलाओं को दिखाई जीने की नई राह

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अब लोग ये मानने लगे हैं कि महिलाएं पुरूषों के कंधे से कंधा मिलाकर काम करती हैं लेकिन सालों पहले ऐसी सोच नहीं थी। इसके बावजूद कई महिलाओं ने समाज के लिए कुछ ऐसा किया कि लोगों को उनसे प्रेरणा मिली।

महिलाओं के लिए बनीं मसीहा

आज हम आपको एक ऐसी महिला के बारे में बताएंगे, जिनकी पूरी जिंदगी हमारे लिए एक उदाहरण है। जी हां, सामाजिक कार्यकर्ता इला रमेश भट्ट, जिन्होंने महिलाओं की मदद के लिए कई कदम उठाए।  उनके हक के लिए उन्होंने सरकार से लेकर कानून तक की मदद ली और महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

14 साल की इला ने भारत को आज़ाद होते देखा

सात सितंबर 1933 को जन्मी इला रमेश भट्ट अहमदाबाद के एक संपन्न परिवार से आती हैं। उनके पिता वकील थे और मां एक्टिविस्ट। इला का लालन पालन महात्मा गांधी के आदर्शों के साथ हुआ। इला महज 14 साल की थीं, जब भारत को आजादी मिली।

महात्मा गांधी की फॉलोअर

आज़ादी के बाद इला ने भारत में कई बदलावों को महसूस किया और शायद बचपन से ही उन्होंने गांधी के आदर्शों को फॉलो किया था, इसी वजह से वह हमेशा महिलाओं को आगे बढ़ाने और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए कुछ करना चाहती थीं।

इमेज: फाइल इमेज

महिला विंग की हेड बनकर जाना महिलाओं का हाल

इला ने अपने करियर की शुरुआत मुंबई में बतौर इंग्लिश टीचर से की। एक साल के बाद वो वापस अहमदाबाद लौटी, तो उन्होंने टेक्सटाइल लेबर एसोसिएशन का लीगल डिपार्टमेंट ज्वाइन किया। लगभग एक दशक तक इस ऑर्गनाइजेशन के साथ काम करने के बाद इला भट्ट को यहां की महिला विंग का हेड बनाया गया। इसका फोकस महिलाओं को सिलाई, बुनाई, टाइपिंग, स्टेनोग्राफी आदि की ट्रेनिंग देना था। इस दौरान इला ने कई महिलाओं के साथ काम किया और जाना कि महिलाओं को किस तरह की समस्याओं से गुजरना पड़ता हैं।

सेवा की शुरुआत

साल 1972 में सेल्फ इंप्लॉयड वुमन एसोसिएशन (सेवा) की शुरुआत हुई, जिसकी इला जनरल सेक्रेटरी थीं। इस संस्था का उद्देश्य अपने सदस्यों को योग्यता के अनुसार काम देना और आत्मनिर्भर बनाना हैं। यह संस्था उन महिलाओं की भी मदद करती हैं, जिन्हें घर, बच्चों की देखरेख, हेल्थकेयर की जरूरत होती हैं।

मूलमंत्र – खुद से पूछो तीन सवाल

समाज में महिलाओं के लिए लगातार काम करने के चलते साल 1979 में उन्हें मागासेसे अवार्ड से सम्मानित किया गया। अवार्ड लेने के बाद अपनी स्पीच में उन्होंने कहा था कि हमें अपने आप से तीन सवाल जरूर करने चाहिए। पहला, मैं जो भी कदम उठाने जा रही हूं उसका मेरे ऊपर क्या असर होगा?  दूसरा, मैं जो भी एक्शन लेने जा रही हूं, उसका ब्रह्मांड और इसमें रहने वाले लोगों पर क्या असर होगा? और आखिरी सवाल कि हमारे एक्शन का आने वाली पीढ़ी और मानवीय स्वभाव पर क्या असर होगा?

उन्होंने समाज के लिए जो बेहतरीन काम किए हैं, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए किसी प्रेरणा से कम नहीं हैं। उनके इस जज्बे को हमारा सलाम।

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