पंखों से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है…

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मंजिलें उन्हीं को मिलती है, जिनके सपनों में जान होती है,

पंखों से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है…

जी हां, सफलता किसी के हाथ और पैरों की मोहताज नहीं होती, बल्कि उसे पाने के लिए हौसलों में दम होना जरूरी है। यहां हम कुछ ऐसे ही लोगों की कहानियां बताने जा रहे हैं, जिन्होंने अपनी शारीरिक कमियों के बदले अपने जज़्बे, जुनून और हौसलों से अपने सपनों को आकार दिया और सफलता की एक नई कहानी लिख डाली।

अरुणिमा सिन्हा

हौसलों से मिलती है जीत | इमेजः बीबीसी

एक सामान्य इंसान के लिए भी एवरेस्ट पर चढ़ाई करना जहां मुश्किल होता है, वहीं केवल एक पांव पर एवरेस्ट को फतह करके अरुणिमा सिन्हा ने दिखा दिया कि जीतने के लिए जज़्बे का होना जरूरी है। दरअसल, अरुणिमा जब लखनऊ से दिल्ली का सफर कर रही थी, तो कुछ क्रिमिनल्स ने उनका बैग और सोने की चेन खींचने का प्रयास किया और उन्हें ट्रेन के नीचे फेंक दिया। इस हादसे में अरूणिमा की जान तो बच गई लेकिन उन्होंने अपना एक पैर गंवा दिया। इससे उनके हौसलें नहीं थमे और कृत्रिम पांव के दम पर अरुणिमा ने 21 मई, 2013 को दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर तिरंगा फहराकर इतिहास रच दिया। ऐसा करने वाली वह पहली दिव्यांग भारतीय महिला हैं।

राजेंद्र सिंह राहेलु

मज़बूत इरादों ने बनाई पहचान |  इमेजः यूट्यूब

महज़ आठ महीने की उम्र में पोलियो ने जिसे ज़िंदगीभर के लिए अपंग बना दिया हो, क्या वह शख्स पॉवरलिफ्टिंग के खेल में नेशनल लेवल पर पहचान बना सकता है? बिल्कुल बना सकता है, बशर्ते उसके पास राजेंद्र सिंह राहेलु जैसा जुनून और हौसला हो। तभी तो उन्होंने केवल अपने हौसलों के दम पर जीवन के तमाम विपरीत हालातों का रुख मोड़ दिया। राजेंद्र ने साल 1996 में अपने दोस्त से इंस्पायर्ड होकर वेटलिफ्टिंग में करियर बनाने का निश्चय किया और फिर नेशनल लेवल पर इस खेल में अपनी पहचान बना ली। राजेंद्र ने साल 2004 में 56 किलो भार वर्ग में एथेंस पैराओलंपिक में ब्रॉन्ज मेडल जीता, वहीं साल 2008 और वर्ष 2012 पैराओलंपिक खेलों में देश को रिप्रेजेंट भी किया। साल 2014 के कॉमनवेल्थ गेम्स में 185 किलो वेट उठा कर उन्होंने सिल्वर मेडल अपने नाम किया।

गिरीश शर्मा

पॉज़िटिव सोच से मिली मंज़िल | इमेजः फेसबुक

जीवन में नामुमकिन कुछ नहीं होता, बस जरूरी है कि अपने हौसले को मज़बूत करके आगे बढ़ते रहना। ऐसी ही कहानी है, गुजरात के राजकोट में रहने वाले बैडमिंटन खिलाड़ी गिरीश कुमार की। गिरीश ने दो साल की छोटी सी उम्र में एक हादसे के दौरान अपना एक पांव गंवा दिया था। लगन के दम पर ही वह आज सिर्फ एक पैर पर खड़े होकर बैडमिंटन खेलते हैं और अच्छे अनुभवी खिलाड़ियों के भी पसीने छुड़ा देते है। बचपन में वह फुटबॉल, क्रिकेट, बैडमिंटन खेला करते थे, फिर 16 साल कर उम्र में इन्होंने बैडमिंटन की ट्रेनिंग लेनी शुरू की। इसके बाद उन्होंने नेशनल लेवल पर बैडमिंटन खेला और दो गोल्ड मेडल हासिल किए। वह इंटरनेशनल लेवल पर भी कई देशों में बैडमिंटन खेल चुके हैं।

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