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आपके व्यवहार से संबंध रखता है ‘पित्त दोष’

आपके व्यवहार से संबंध रखता है ‘पित्त दोष’

  • पित्त दोष को कम करने के लिए योग और आहार की अहम भूमिका है।
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मनुष्य का शरीर पांच तत्वों से मिलकर बना है – जल, पृथ्वी, आकाश, अग्नि और वायु। आयुर्वेद की मानें तो आपके शरीर का स्वस्थ रहना वात, पित्त और कफ पर निर्भर करता है। अगर इन तीनों में से कोई भी असंतुलित हो जाए तो आपके स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचने लगता है। यही कारण है कि इन्हें त्रिदोष भी कहा जाता है।

क्या है पित्त दोष?

शरीर के पांच में से दो तत्व ‘अग्नि’ और ‘जल’ के मिलने से पित्त दोष बनता है। इससे आपके शरीर के एंजाइम्स और हार्मोंस नियंत्रित होते हैं। पित्त आपके शरीर की गर्मी जैसे कि आपके शरीर का तापमान और पाचक अग्नि को भी नियंत्रित करता है। मनुष्य के शरीर में पित्त पेट और छोटी आंत में पाया जाता है।

वैसे पित्त दोष बढ़ने के कारण पेट से जुड़ी समस्याएं होने लगती हैं जैसे कि कब्ज, अपच, एसिडिटी आदि। लेकिन क्या आप यह जानते हैं कि पित्त दोष का आपके शरीर के साथ-साथ आपके स्वभाव पर भी असर पड़ता है।

पित्त दोष का स्वभाव पर असर

  • पित्त दोष के बढ़ने से आपके अंदर अधीरता बढ़ जाती है।
  • बहुत जल्दी निराश होने लगते हैं।
  • अहंकार आ जाता है।
  • लोगों से नाराज़ होने लगते हैं।
  • दूसरों से किसी न किसी बात पर ईर्ष्या या द्वेष रखते हैं।
  • मन में अस्थिरता की भावना रहती है।

लेकिन अगर आपके शरीर का पित्त संतुलन में रहे, तो आपके अंदर अपने इरादे और लक्ष्यों का पीछा करने की क्षमता बढ़ जाती है। आप आसानी से अपना ध्यान किसी भी चीज़ पर केंद्रित कर सकते हैं। आपके अंदर समस्या को सुलझाने की क्षमता बढ़ जाती है। साथ ही आपका आत्मविश्वास आसमान की ऊंचाइयों को छूने लगता है।

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कैसे रखें पित्त को संतुलित?

अपने आहार पर ध्यान दें

पित्त शांत करने वाली चीज़ें खाएं जैसे कड़वा, कसैला और मीठा। दूध, दही, मक्खन और मलाई को पित्त दोष शांत करने के लिए बेहद अच्छा माना जाता है। खट्टे की जगह मीठे फल खाएं और शहद व गुड खाने से बचें।

काम और आराम के बीच ताल-मेल बनाएं

न ज़रूरत से ज़्यादा शारीरिक काम करें और न ही ज़रूरत से अधिक आराम करें।

अच्छे माहौल में रहें

अच्छे लोगों की संगत में रहे, अच्छा पौष्टिक खाएं और पार्क या समुद्र-झील किनारे बैठें।

ध्यान लगाएं

मेडिटेशन के लिए समय ज़रूर निकालें और आपके पास जो कुछ भी है, ईश्वर को उसका धन्यवाद दें।

योग

मर्जरी आसन, शिशु आसन, चंद्र नमस्कार, भुजंग आसन, विपरीतषलभ आसन, पश्चिमोत्तान आसन, अर्ध नौकासन, अर्ध स्वांगासन, सेतुबंधनासन, शवासन और सांस लेने की अलग-अलग प्रकिया।

इन बातों का ध्यान रखकर आप पित्त को संतुलित रख सकते हैं।

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