एक कदम स्मार्ट बच्चों की ओर

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किताबों की दुनिया बड़ी ही खूबसूरत होती है, कहते हैं इस दुनिया में खो कर कुछ भी पाया जा सकता है। लेकिन जैसा कि हम जानते हैं समय बदल रहा है और पढाई का तरीका भी, और अब जमाना भी स्मार्ट स्टडीज़ की तरफ बढ़ रहा है। इसी मुहिम का हिस्सा बैग फ्री स्कूल भी है।

कुछ दिनों पहले मानव संसाधन मंत्रालय ने एक गाइड लाइन जारी की थी, जिसमें स्कूली बैग के बढ़ते बोझ को नियंत्रित करने की कोशिश की गई थी ताकि स्कूली बैग के बोझ से दबे बच्चों को स्मार्ट बनाया जा सके। खैर, सरकार के इस सपने को साकार किया है, केरल के वायानद स्कूल ने।

संवेदना ने बना दिया बैग फ्री स्कूल

स्कूल अथॉरिटी का कहना है कि बच्चों के बीच कॉम्पटीशन बढ़ रहा है और इसके साथ ही किताबों का बोझ भी बढ़ रहा है। इससे न सिर्फ बच्चों को शारीरिक बल्कि मानसिक तौर पर भी स्ट्रेस देता है। इसलिए स्कूल प्रशासन ने अपने स्कूल को बैग फ्री स्कूल बनाने का निर्णय लिया और आज सर्व इंडिया लोअर आदिवासी प्राइमरी स्कूल एक बैग फ्री स्कूल के नाम से जाना जाता है।

किताबों के बोझ से दूर | इमेज: फाइल इमेज

अच्छे प्रबंधन से लागू हुई व्यवस्था

सर्व इंडिया लोअर आदिवासी प्राइमरी स्कूल ने जब इस व्यवस्था को अपनाने का निर्णय लिया, तो उनके सामने बजट की समस्या थी। इसके साथ पढ़ाई का यह मसला ट्राइबल बच्चों से जुड़ा हुआ था, इसलिए निर्णय को लागू करना ज़रूरी था। इस निर्णय को शुरू करने का साथ स्कूल ने घर के लिए अलग स्टडी मटेरियल और स्कूल के लिए अलग स्टडी मैटीरियल की व्यवस्था की। इसके साथ ही स्टडी से जुड़ी बातों को ध्यान रखने के लिए एक डायरी में होमवर्क नोट करवाने की शुरुआत की।

अगर एक लाइन में कहें, तो जहाँ पहले दस टेक्स्टबुक की ज़रूरत होती थी, तो वहीँ अब यह सिर्फ एक नोटबुक में सिमट गई।

इस स्कूल की सबसे महत्वपूर्ण बात यह भी है कि पढ़ाई की क्वालिटी के साथ बच्चों के विकास को ध्यान में रखते हुए क्विज कॉम्पटीशन, लाइब्रेरी नोट्स तैयार करवाना जैसे काम करायें जा रहे हैं।

दूसरों के लिए बना प्रेरणा

बच्चों के लिए वायानद स्कूल द्वारा किये गए बेहतरीन काम आज आसपास के स्कूलों के लिए प्रेरणा का काम कर रहे है।

सर्व शिक्षा अभियान के जिला कार्यक्रम अधिकारी ने सर्व इंडिया लोअर आदिवासी प्राइमरी स्कूल के इस कार्यक्रम को मोस्ट क्रिएटिव बताया है और साथ ही अपील की है कि वायानद स्कूल के इस मॉडल को सभी स्कूलों को अपनाना चाहिए। इससे स्किल इंडिया, सब पढ़े-सब बढ़े जैसे अभियान किताबों के बोझ से ऊपर उठकर पूरे हो सके।

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