कचरा प्रबंधन में सूरत बना मिसाल

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कचरा प्रबंधन को सस्टेनेबल विकास का महत्वपूर्ण फैक्टर माना जाता है। सस्टेनेबल विकास का मतलब पर्यावरण फ्रेंडली और लॉन्ग टर्म विकास से है। कचरे को दोबारा इस्तेमाल करने से हमारी प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भरता काफी हद तक कम हो जाती है। इसलिए इन दिनों सस्टेनेबल विकास की योजना बनाते समय कचरा प्रबंधन पर बहुत ज़ोर दिया जाता है।

सूरत में 165 साल पहले हुआ शुरू

हालांकि, देश आज कचरा प्रबंधन की दिशा में जागरूक और अग्रसर हुआ है लेकिन बता दें कि गुजरात के सूरत शहर में आज से 165 साल पहले कचरा प्रबंधन का काम शुरू कर दिया गया था। वहां कचरा जमा करने के लिए लकड़ी के कंटेनरों को शहर की प्रमुख सड़कों पर रखा गया था, जिसमें लोग कूड़ा-कचरा डालते थे और कंटेनरों के भर जाने के बाद सिविक बॉडी के लोगों द्वारा इसे शहर के बाहरी इलाकों में निपटाया जाता था।

डोर-टू-डोर कचरा लेना

उस समय भी घर-घर से कचरा जमा करने के लिए बैलगाड़ियां शहर के विभिन्न क्षेत्रों में जाती थीं, ठीक उसी तरह जिस तरह आज डोर-टू-डोर कचरा लिया जाता है। उस वक्त सिविक बॉडी के कर्मचारी गाड़ी में घंटी लटकाते थे, ताकि लोगों को उनके आने की जानकारी मिल सके।

सड़कों पर थे कचरे के कंटेनर

‘19वीं शताब्दी सूरत’ नाम की अपनी पुस्तक में प्रसिद्ध इतिहासकार मोहन मेघानी लिखते हैं कि कचरा संग्रह कंटेनरों को पहली बार साल 1852 में शहर की सड़कों पर रखा गया था। दिलचस्प बात यह है कि अब 165 साल के बाद शहर अपनी कचरा प्रबंधन नीति में बदलाव देख रहा है, क्योंकि अधिकारियों द्वारा कचरे के कंटेनरों को सड़कों से हटाया जा रहा है।

कचरे को मैनेज करना जरूरी | इमेज: जस्टडाइल

शहर को दोबारा बसाया गया

अपनी पुस्तक में मेघानी लिखते हैं कि एक समय था, जब सूरत शहर बाढ़ और आगजनी की बड़ी घटनाओं से जूझ रहा था। 19वीं शताब्दी की शुरुआत में इस बंदरगाह शहर के कई हिस्सों को प्राकृतिक आपदाओं ने घेर लिया था। ऐसे में एक बिजनेसमैन के ग्रुप ने आपदाओं से बर्बाद शहर को फिर से बसाने की कोशिश की थी। चूंकि, बाढ़ और आग के कारण शहर का एक बड़ा हिस्सा मलबे में बदल गया था। इसलिए शहर के इंफ्रास्ट्रक्चर को डेवलप किया गया, जिसमें वेस्ट मैनेजमेंट पहली प्राथमिकता थी।

फिर शहर ने देखा बड़ा बदलाव

हालांकि, साल 1996-97 में म्युनिसिपल कमिश्नर एस आर राव के कार्यकाल में शहर की कचरा प्रबंधन नीति में बड़ा सुधार देखा गया, क्योंकि प्लेग के प्रकोप के बाद, स्वास्थ्य और स्वच्छता के क्षेत्रों में बड़े बदलाव जरूरी थे। इसके लिए झोपड़ियों में बड़े पैमाने पर सफाई अभियान शुरू किया गया और बाद में विकसित क्षेत्रों को कवर किया गया। सूरत नगर निगम ने भी उन लोगों को दंडित करना शुरू कर दिया, जो कचरे को यहां-वहां फेंकते थे। साथ ही लोगों को इस संबंध में जागरूक भी किया गया।

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इमेज: पीआरआई

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