कोरोना योद्धाओं के साहस की कहानी

आपबीती इन कोरोना योद्धाओं की, जिन्होंने इस मुश्किल घड़ी में काम किया
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कोविड-19 की महामारी के कारण मार्च से शुरू हुए लॉकडाउन में भले ही अब ढील दी जा रही है, लेकिन संक्रमण के मामले दिनों-दिन बढ़ते जा रहे हैं। ऐसे में आम लोगों के साथ ही उन कोरोना वॉरियर्स की ज़िम्मेदारियां भी बढ़ती जा रही हैं जो पिछले कई महीनों से लोगों की सुरक्षा के लिए दिन-रात काम कर रहे हैं।

कोरोना योद्धा

कोविड-19 के इस दौर ने एक नया शब्द दिया है कोरोना योद्धा यानी ऐसे लोग जो इस महामारी के दौर में अपनी और अपने परिवार के सुरक्षा से ऊपर आम लोगों की सुरक्षा को तवज्जो दे रहे हैं और उनकी जान बचाने के लिए अपनी जान जोखिम में डाल रहे हैं। डर तो इन्हें भी लगता है, क्योंकि आखिरकर है तो यह भी इंसान ही, लेकिन इनके फर्ज के आगे कोरोना का डर अपने आप खत्म हो जाता है और खुद को मानसिक रूप से मज़बूत बनाते हुए हर दिन यह कोरोना योद्धा अपने काम में जुट जाते हैं। आइये जानते हैं इनकी कहानी-

डॉ. शिफा एम मोहम्मद

मरीज़ों की जान है ज़रूरी |इमेज : फेसबुक

केरल की इस युवा डॉक्टर ने कोरोना काल में लोगों की सेवा के लिए अपनी शादी टाल दी। दरअसल, मार्च महीने में ही इनकी शादी होनी थी, लेकिन जैसे ही कोरोना की वजह से लॉकडाउन लगा तो डॉ. शिफा ने अपने फर्ज को अहमियत देते हुए मरीजों की देखभाल को प्राथमिकता दी। उनका कहना था कि शादी तो इंतज़ार कर सकती है, लेकिन मेरे मरीज नहीं। ऐसे बहुत से डॉक्टर हैं जो खुद को और अपने परिवार को जोखिम में डालकर भी मरीजों की सेवा में लगे हैं।

कॉस्टेबल तेजस सोनवणे

मदद करने से मिलती है खुशियां |इमेज : द लोजिकइंडिया

राज्य में शांति व्यवस्था बनाए रखने की ज़िम्मेदारी निभाने वाले पुलिस विभाग के काम को कोरोना ने पूरी तरह से बदल डाला है। अब उनकी ज़िम्मेदारी पहले से कई गुना बढ़ चुकी है। कई तो हेल्थ वर्कर की भी भूमिका निभा रहे हैं। मुंबई के कफ परेड इलाके के कॉस्टेबल तेजस सोनवणे उन्हीं पुलिसवालों मे से एक हैं। कुछ समय पहले उन्होंने अपने दोस्त से एक कार ली और उसे एंबुलेंस में तब्दील कर दिया। पुलिस की ड्यूटी खत्म होने के बाद भी वह हेल्थ वर्कर की ज़िम्मेदारी निभाते रहते हैं।

राजेंद्र- सफाई कर्मचारी

डॉक्टर और पुलिस की तरह ही सफाई कर्मचारियों ने भी इस मुश्किल घड़ी में अपना फर्ज बखूबी निभाया है। जब आम लोग कोरोना के डर की वजह से घर में बंद थे तब भी सफाई कर्मी बिल्डिंग और सोसायटी को सैनिटाइज़ करने का अपना काम करते थे। एक सोसायटी में काम करने वाले राजेंद्र के मुताबिक, डर तो मुझे भी लगता था, मेरी 2 साल की बेटी है। मगर फिर हिम्मत करके काम पर निकल जाता, क्योंकि अगर मैंने सफाई नहीं की तो गंदगी और ज़्यादा फैलेगी और लोग बीमार पड़ेंगे। बस बेटी का मुस्कुराता चेहरा देखकर मुझे हिम्मत मिलती थी और मैं अपना काम करता रहता।

शैलेंद्र सिंह, टीवी मीडियाकर्मी

काम के साथ सुरक्षा भी है ज़रूरी | इमेज : शैलेंद्र सिंह

कोरोना ऐसी बीमारी है जो छूने और किसी के संपर्क में आने से भी फैल जाती है। ऐसे में संक्रमित इलाके की रिपोर्टिंग करना किसी भी पत्रकार के लिए आसान नहीं था, मगर उनकी तो ड्यूटी है तो उन्हें करना है। एक चैनल में पत्रकार शैलेंद्र बताते हैं, “रिपोर्टिंग के लिए जाते समय मैं पूरी एहतियात बरतता हूं। शुरुआत में तो एक महीने घर जाने के बाद मैं अलग कमरे में ही रहता था, क्योंकि मुझे अपने बच्चे और बुजुर्ग माता-पिता की टेंशन थी। मैंने शुरू से ही मास्क, सैनिटाइजेशन से लेकर सोशल डिस्टेंसिंग तक हर तरह के नियमों का पालन किया है। थोड़ा डर तो मन में रहता है, लेकिन रिपोर्टिंग तो मेरा काम और डर कर्तव्य से बड़ा नहीं होता।

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