दिव्यांग ने ई-वेस्ट से बनाई ई-बाइक

“ ई-वेस्ट से बेहतर चीज़ें बनाकर मेक इन इंडिया में सहयोग देना चाहता हूं। “ विष्णु पटेल
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प्रतिभा किसी की मोहताज नहीं होती, 60 साल के दिव्यांग ने यह साबित कर दिया कि बड़े से बड़ा मुकाम हासिल करने के लिए संसाधनों की नहीं, कड़ी मेहनत की ज़रूरत होती है। इसी मेहनत और लगन ने उन्हें एक नई पहचान दी है।

कौन है विष्णु पटेल?

गुजरात के सूरत के रहने वाले विष्णु पटेल जन्म से ही पोलियो की बीमारी से ग्रस्त है और उन्हें जन्म से ही सुनने में दिक्कत है।  उन्होंने कभी भी दिव्यांगता को अपनी कमज़ोरी नहीं बनने दिया, बल्कि उन्होंने हर एक मुश्किल से ऊंचा उठकर अपनी राह खुद बनाई।

कबाड़ से बनाते हैं बाइक

आपके घर में अगर इलेक्ट्रॉनिक कबाड़ होता है, तो आप उसे कबाड़ी को दे आते हैं या उसे फेंक देते हैं, लेकिन विष्णु ऐसे व्यक्ति है जो किसी भी तरह के इलेक्ट्रॉनिक और मैकेनिकल वेस्ट को फेंकते नहीं है, बल्कि उसे संभाल कर रखते हैं क्योंकि जो बाकी लोगों के लिये कबाड़ का सामान है, वह इनके लिये नई इनोवेशन का सामान है।

दिव्यांग ने ई-वेस्ट से बनाई ई-बाइक
ई-वेस्ट से किया इनोवेशन |इमेज : ट्विटर

विष्णु ने पांचवी क्लास तक ही पढ़ाई की है और उनके  पास कोई प्रोफेशनल ट्रेनिंग नहीं है। इसके बावजूद उन्होंने बिना किसी मदद के अलग – अलग तरह के इलेक्ट्रॉनिक कचरे का इस्तेमाल कर ‘ई बाइक’ का इनोवेशन किया है। इस बाइक की खासियत यह है कि इसे पुरानी चीज़ों, जैसे कि गाड़ियों  के पुराने कल-पुर्जे, लेपटॉप-मोबाइल आदि की बैट्री का इस्तेमाल करके तैयार किया है।

पर्यावरण को है बचाना

ई- वेस्ट से अपने काम की चीज़ों को ढ़ूंढकर, उसे अपने उपयोग में लाना ही विष्णु के काम करने के तरीके को अलग बनाता है। विष्णु पर्यावरण को बचाने के लिये भी यह काम करते हैं ताकि ई -वेस्ट से पर्यावरण को कोई नुकसान न हो और अपने आइडिया से काम भी बन जाये।

कबाड़ से ई-बाइक बनाने का ये आइडिया आनंद महिंद्रा को इतना पसंद आया कि उन्होंने अपने ट्विटर हैंडल पर विष्णु से मिलने और आर्थिक मदद करने की इच्छा जताई है।

दिव्यांगों के लिये बनाए व्हीकल

जो संघर्ष विष्णु ने अपने जीवन में किया है, उसे किसी और दिव्यांग को न झेलना पड़े, इसी को मद्देनज़र रखते हुए उन्होंने अपने इनोवेशन के माध्यम से अन्य दिव्यांगों के लिए कुछ इनोवेटिव व्हीकल बनाए हैं। इन गाड़ियों को कोई भी दिव्यांग आसानी से चला सकता है। साथ ही, उनका सपना है कि वे अपने इन इनोवेटिव से ‘मेक इन इंडिया’ में भी योगदान दें।

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