वक्त के साथ कितने बदल गये पारंपरिक बर्तन

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कटलरी का मतलब होता है खाना बनाने, परोसने और खाने में इस्तेमाल होने वाले बर्तन। इसमें कड़ाही से लेकर प्लेट, चम्मच और चाकू सब आ जाते हैं। आज इस्तेमाल होने वाली सभी कटलरी के साथ इतिहास जुड़ा हुआ है। हर बर्तन के विकास और बदलाव के पीछे एक कहानी है।

भूगोल के हिसाब से बर्तनों का विकास

पुराने समय में बर्तनों का विकास उपलब्ध सामग्री, इस्तेमाल का मकसद और जगह के भूगोल पर निर्भर करता था। जैसे रेगिस्तानी इलाके में वनस्पति की कमी थी, तो वहां मिट्टी के बर्तनों का इस्तेमाल हुआ, नदी किनारे बसे लोगों ने चिकनी मिट्टी के बर्तन बनायें और जंगलों में रहने वालों ने लकड़ी से चीज़ें बनाईं।

वक्त के साथ बदलाव

20वीं सदी की शुरुआत में कच्चे लोहे के बर्तनों का उपयोग शुरू हुआ, लेकिन इन्हें गर्म होने में अधिक समय लगता था। जल्द ही इसकी जगह तांबे के बर्तनों ने ली। हालांकि खाना बनाने के दौरान तांबे भोजन में मिलकर उसे जहरीला बना देता था, इसलिये इस समस्या को तांबे पर परत चढ़ाकर दूर किया गया जिसे कलई कहते हैं। 20वीं सदी के मध्य में एल्यूमीनियम का इस्तेमाल शुरू हुआ, लेकिन जल्द ही इसकी जगह स्टील ने ले ली और यह अब तक का सबसे अधिक प्रचलित है।

वक्त के साथ कितने बदल गये पारंपरिक बर्तन
पारंपरिक बर्तनों का उपयोग |इमेज : फाइल इमेज

आकार में बदलाव

बर्तनों के लिए इस्तेमाल होने वाले धातुओं में ही बदलाव नहीं हुआ, बल्कि समय के साथ इसका साइज़ और आकार भी बदलता है। समुद्र किनारे पाये जाने वाले सीप का चम्मच की तरह इस्तेमाल किया जाता था। इसे इस्तेमाल में आसान बनाने के लिए बाद में इसमें लकड़ी और हड्डियों का हैंडल लगाया गया। इसी तरह चाकू पत्थर, कांसे, स्टील से बने होते थे और इनका हथियार की तरह उपयोग होता था। भारतीय कटलरी के बस कुछ उदाहरण है जो आधुनिकीरण के साथ खोते जा रहे हैं।

इतिहास और परंपरा को बचाने की कवायद

समय के साथ लुप्त होते जा रहे बर्तनों के इतिहास को कुछ कला और संस्कृति प्रेमियों ने ज़िंदा रखने की कोशिश की है। उन्हीं में से एक है मशहूर शेफ विकास खन्ना, जिन्होंने मणिपाल में अल्मा मेटर के साथ मिलकर “पाक कला संग्रहालय” बनाया है। जहां हड़प्पा युग से पहले के भी बर्तन हैं। कुछ कलाकृतियों में पुर्तगालियों द्वारा बनाई प्लेट, सीड स्प्रिंक्लर, प्राचीन समोवर (टीपॉट), कई तरह के छानने और कद्दूकस करने वाली चीजें, नक्काशीदार मसाले के बॉक्स, बेलन, मापने की चीज़ें आदि शामिल हैं।

वक्त के साथ कितने बदल गये पारंपरिक बर्तन
पारंपरिक बर्तनों का उपयोग |इमेज : फाइल इमेज

आने वाली पीढ़ी के लिए विरासत सहेजना

पाक कला संग्रहालय के ज़रिये विकास खन्ना भारत की समृद्ध पाक विरासत को संरक्षित करके आने वाली पीढ़ी को इसके बारे में जानकारी देना चाहते हैं। विकास खन्ना का मानना है कि दुनिया में ऐसी कोई और जगह नहीं है जहां इतनी विविधता हो, इसलिये हमें इसकी पूजा करनी चाहिये। मातृभूमि के लिये कुछ करने के लिए उन्होंने हज़ारों साल पहले से लेकर आजतक के बर्तनों का अध्ययन किया। भारत की अलग-अलग कलाओं को एकत्र करने के लिये पूरे देश की यात्रा की ताकि एक दिन वह संग्रहालय बना सके।

अतीत की सैर

यहां आकर आप कटलरी के सुनहरे अतीत की सैर कर सकते हैं। कुछ बर्तनों को देखकर अतीत की यादें ताज़ा हो सकती है। बर्तनों की विरासत को सहेजने वाला यह संग्रहालय  समय-समय पर अपने बर्तनों को न्यूयॉर्क, मैड्रिड, टोक्यो, बीजिंग, लंदन और दुनिया भर के अन्य शहरों में भारतीय पाक विरासत का प्रदर्शन करने के लिये लोन पर देता है। ऐसा ही एक अन्य म्यूज़ियम ‘विचार’ अहमदाबाद, गुजरात में विशाला रेस्तरां के परिसर में स्थित है। जिसे सुरिंदर पटेल ने बनवाया है।

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