साल 2020 ने समझाई रिश्तों की अहमियत

ज़िंदगी में रिश्ते कितने महत्वपूर्ण है, सभी ने इसे कोरोना महामारी ने समझा
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ज़िंदगी में रिश्ते बहुत मायने रखते हैं, लेकिन अक्सर इंसान करियर और पैसा कमाने में इतने बिज़ी हो जाते हैं रिश्तों को भूल जाते है, लेकिन कोविड-19 ने अब लोगों को रिश्तों की अहमियत समझा दी है। लॉकडाउन में जब सब दुनिया से कटकर घर की चारदीवारी में कैद हो गए थे तो डर और संदेह के इस माहौल ने अपनों को और करीब ला दिया और जो साथ नहीं थे वह तकनीक के सहारे अपनों से जुड़ने लगें। कुल मिलाकर कोरोना ने रिश्तों को करीब ला दिया।

सच्ची खुशी अपनों के साथ में है

36 साल की संजना लॉकडाउन का अपना अनुभव साझा करते हुए बताती हैं, ‘शादी के 12 सालों में हम दोनों अपने बेटे और करियर को लेकर इस कदर व्यस्त थे कि कभी फुर्सत ही नहीं मिली साथ बैठकर बातें करने की और आराम से चाय की चुस्कियां लेने की। मगर कोरोना काल में हमने एक-दूसरे के साथ इतना वक्त साथ बिताया जितना पिछले एक दशक में नहीं बिता पाए और ऐसा लगता है अब हम एक-दूसरे को सच में समझते हैं, वरना पहले तो सिर्फ बाहरी ज़रूरते ही पूरी होती थी, अपने मन को तो हम समझ ही नहीं पाए थे कि वह पैसा नहीं प्यार और शांति चाहता है।’

दोस्तों को करीब लाया

करियर और परिवार की ज़िम्मेदारियों में उलझकर अक्सर हम अपने पुराने दोस्तों को भूल जाते हैं। राहुल के साथ भी ऐसा ही हुआ, लेकिन जब लॉकडाउन में अकेलापन उसे काटने लगा तो उसने मोबाइल में पुराने दोस्तें के नबर खंगाले और कुछ दोस्तों को फोन करना शुरू किया। फिर क्या था कॉलेज और स्कूल के कुछ पुराने दोस्तों से उसका रिश्ता गहरा होता चला गया और जिनसे कभी बात नहीं होती थी, उनके साथ अब हफ्ते में एक बार तो वीडियो कॉल में मीटिंग हो ही जाती है।

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एक दूसरे के साथ अनमोल समय बिताएं | इमेज : फाइल इमेज

बॉस और कर्मचारी के रिश्तों में दिखी इंसानियत

महामारी में जहां बहुत से लोगों को नौकरी से हाथ धोना पड़ा, वहीं कुछ बॉस ऐसे भी थे जिन्होंने इंसानियत दिखाई और कर्मचारियों की मदद के लिए आगे आएं। इस तरह से उन्होंने मानवता का न सिर्फ धर्म निभाया, बल्कि कर्मचारी और बॉस के रिश्ते को भी मज़बूती दी। अब मुश्किल वक़्त में कर्मचारी अपने नियोक्ता की ओर उम्मीद भरी नज़रों से देख सकता है।

खुद से रिश्ता हुआ मज़बूत

अनिश्चिता के इस माहौल में कुछ लोगों जहां के करीब आएं, तो कुछ ने खुद को तलाशा। इस दौरान अपना पसंदीदा वह सब काम किया जो नौकरी की व्यस्तता के कारण पहले कभी नहीं कर पाए। ढेर सारी किताबें पढ़ने से लेकर, रंगों के साथ खेलना या पाक कला में अपना हुनर आज़मना। ऐसा काम जो अंदर से खुशी और संतुष्टि देता है उसे करके ही आप खुद को असल मायने में समझ पाते हैं। मेघा कहती हैं, अकेलेपन से शुरू में थोड़ा डर तो लगा, मगर फिर मैंने अपने शौक का ही अपना साथी बना लिया और अब अकेले रहकर भी मैं खुश हूं।‘

दरअसल, ज़िंदगी की सच्ची खुशी है मन की शांति और अपनों का साथ। यदि कभी अपने साथ न भी हों, तो आप यदि खुद से प्यार करना और खुद को खुश रखना सीख जाते हैं तो कभी दुखी नहीं होंगे।

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