सुतली से बनी ड्रेस है ईकोफ्रेंडली

पर्यावरण बचाने के लिए सुतली से बने कपड़े हैं मददगार
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आज ज़्यादातर लोगों के ज़हन में एक सामान्य बात उठती है कि कैसे अपने पर्यावरण को बचाया जाए। ऐसे में लोग उन विकल्पों का चुनाव करते हैं, जिन्हें बार-बार इस्तेमाल में लाया जा सके और कपड़े ऐसी बेसिक चीज़ है, जिसका इस्तेमाल हर व्यक्ति करता है, यानि ऐसे फैब्रिक की ज़रूरत है, जो ईको-फ्रेंडली हो। आज हम आपको एक ऐसे फैब्रिक, ‘हेंप’ यानी कि सुतली के बारे में बताने जा रहे हैं, जो सदियों से मौजूद है, और एक बार फिर प्रचलन में आ गया है।

हालांकि कपड़े बनाने के लिए ऐसे कई फैब्रिक्स मौजूद हैं, जो लोगों की पहली पसंद हैं, लेकिन पिछले कुछ सालों से अपने ईको-फ्रेंडली की वजह से सुतली लोकप्रियता हासिल कर रहा है। इसके लोकप्रिय होने के पीछे भी कई कारण हैं। तो चलिए आपको बताते हैं कि क्यों सुतली आपके और हमारी पृथ्वी के लिए एक अच्छा विकल्प है।

सुतली का इतिहास

सुतली से बनी ड्रेस है ईकोफ्रेंडली
फायदेमंद है सुतली | इमेज : फाइल इमेज

ये कैनाबिस सातिवा पौधे का स्ट्रेन होता है, जिसका इतिहास 8,000 बीसी से चीन और मिडिल ईस्ट में पाया जाता है। वैसे तो आमतौर पर इस फैब्रिक का इस्तेमाल मिट्टी के बर्तनों में सजावट के लिए किया जाता था और इस फसल का उत्पादन कपड़ा बनाने के लिए ही किया जाता था। मिडिल ईस्ट और चीन में इस फाइबर का इस्तेमाल कपड़ा, फिशनेट और रस्सियां बनाने के लिए किया जाता था और इसके बीज का इस्तेमाल ब्यूटी प्रॉडक्ट्स बनाने के लिए किया जाता था।

इस्तेमाल

इसके अलावा हेंप का इस्तेमाल दवाइयां बनाने के लिए भी किया जाने लगा। पहली प्रिंटिड बुक गटनबर्ग बाइबल को भी सुतली के पेपर पर प्रिंट किया गया था। दिलचस्प बात यह कि 16वीं से 19वीं शताब्दी तक हेंप का इस्तेमाल टैक्स भरने के लिए भी किया जाता था। एक समय पर इस पौधे की लोकप्रियता इतनी थी कि किसी किसान के इसकी खेती करने से इंकार करने पर वो जेल भी जा सकता था। लेकिन वक्त के साथ इसकी लोकप्रियता कम होती चली गई। हालांकि एक बार फिर यह प्रसिद्ध होने लगा है, और यह बहुत अच्छी बात है क्योंकि सुतली का फैब्रिक कपड़ों का एक बेहतरीन विकल्प है।

सुतली है लाभकारी

सुतली से बनी ड्रेस है ईकोफ्रेंडली

ये ज़्यादातर चीन में पाई जाती है लेकिन इसके अलावा इसकी खेती यूरोप, नॉर्थ कोरिया और साउथ अमेरिका में भी होती है। इस पौधे की सबसे अच्छी बात यह है कि इसकी लंबाई 5 फीट से लेकर 15 फीट तक जाती है और यह कम पानी की खपत के साथ 70 से 110 दिनों के अंदर बड़ी तेज़ी से बढ़ जाता है। देखा जाए तो एक एकड़ में 226 किलो कॉटन उगती है, तो वही इतनी ही जगह में करीब 680 किलो सुतली उगाई जा सकती है। जिसका मतलब है कि कॉटन के मुकाबले यह 250% ज़्यादा उगाई जा सकती है, तो वहीं फ्लैक्स के मुकाबले 600% ज़्यादा उगाई जा सकती है। यही कारण है कि इस फसल में लागत कम आती है और फायदा ज़्यादा होता है। इसके अलावा हेंप मिट्टी को साफ करती है और उसमें पानी का मात्रा बनाए रखती है, जिससे यह मिट्टी भविष्य में उगने वाली फसलों के लिए भी समृद्ध रहती है।

सुतली की विशेषता

यह बहुत मज़बूत फाइबर है। ऐसा कहा जाता है कि सुतली पहली अंतरराष्ट्रीय फसल थी, जिसे कपड़ा बनाने के लिए उगाया जाता था।

  • इससे बने कपड़े में बैक्टीरिया नहीं पनपते, इसलिए यह त्वचा के लिए भी अच्छा माना जाता है। 1920 के दशक में करीब 80% कपड़े सुतली के बने होते थे।
  • सुतली से बना हुआ कपड़ा हर धुलाई के बाद पहले से ज़्यादा मुलायम हो जाता है और नमीं को सोखने के साथ-साथ आपको सूर्य की कड़ी किरणों से भी बचाता है।
  • इसे किसी दूसरे फैब्रिक जैसे सिल्क या कॉटन के साथ आसानी से मिलाया जा सकता है।
  •  इसकी खेती में किसी भी आर्टिफीशियल फर्टिलाइज़र या पेस्टिसाइड्स की ज़रूरत नहीं पड़ती।
  •  चूंकि सुतली का जीवन चक्र कुछ ही महीनों की होती हैं, इसलिए इसे रिन्युएबल एनर्जी का एक बड़ा स्त्रोत माना जाता है।

सुतली से तौलिए, कालीन, पर्दे, जूते और यहां तक कि बड़े तिरपाल जैसे कई उत्पाद बनाए जाते हैं। अब हेंप के कपड़ों का उपयोग लगातार बढ़ रहा है और देश में ऐसे कई लेबल हैं जो इस फैब्रिक से कपड़े बनाते हैं।

इसलिए अगली बार जब कोई ड्रेस खरीदने जाएं, तो याद रखें कि आपके पास एक और विकल्प है – सुतली।

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