आओ पढ़ें, आगे बढ़ें

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इस बात को तो सभी मानते है कि आगे बढ़ने के लिए पढ़ना-लिखना बहुत ज़रूरी होता है लेकिन आज भी एक बड़ी तादाद है, जो शिक्षा से कोसो दूर हैं। इनमें से ज़्यादातर लोग ऐसे हैं, जो आर्थिक तंगी के कारण स्कूल नहीं जा पाते। इस मुश्किल का हल करने के लिए देशभर में हज़ारों सरकारी स्कूल हैं लेकिन समस्या यह है कि स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति कम ही रहती है। ऐसे में देश के अलग-अलग हिस्सों के शिक्षकों ने अपने स्कूल को कुछ इस तरह से पेंट किया है कि बच्चे वहां आने से खुद को रोक नहीं पा रहे हैं। पहले पीली दीवारों वाले स्कूल अब ट्रेन के डिब्बे जैसे दिखते हैं, जो बच्चों को सबसे ज़्यादा आकर्षित कर रहे है। देश के अलग-अलग स्कूलों ने किस तरह रेलवे मॉडल को लागू किया है, जानने के लिये पढ़िये-

आओ पढ़ें, आगे बढ़ें
कैप्शनः स्कूल बने रेल के डिब्बे  | इमेज: एनडीटीवी

फिरोज़ाबाद, उत्तर प्रदेश

स्वच्छ भारत अभियान को बढ़ावा देते हुए यूपी के फिरोज़ाबाद जिले के एक स्कूल को ट्रेन का लुक दिया गया है। स्कूल के एक हिस्से को इलेक्ट्रिक इंजन और पीछे के कमरों को डिब्बे का लुक दिया है। डिस्ट्रिक्ट एडमिनिस्ट्रेशन ने इस स्कूल का नाम बदलकर ‘स्वच्छता एक्सप्रेस’ रख दिया है। पहली से आठवी तक के इस स्कूल में 170 विद्यार्थी और आठ टीचर हैं। कक्षा 7 के छात्र शिवरू कहते हैं कि मेरे गांव के लोग मेरे स्कूल को देखने आए थे। यह वास्तव में एक ट्रेन की तरह दिखता है। मुझे स्कूल जाना बहुत पसंद है लेकिन स्कूल यह लुक मुझे रोमांचित करता है।

यूपी सरकार ने फिरोज़ाबाद के दस और स्कूलों को चुन लिया है, जिनको इसी कॉंसेप्ट पर डिज़ाइन किया जाएगा।

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कैप्शनः स्कूल बने रेल के डिब्बे  | इमेज: एनडीटीवी

मैसूर, कर्नाटक

कर्नाटक के पिछड़े इलाकों के स्कूल टीचर्स ने भी ट्रेन मॉडल के अनोखे डिज़ाइन को अपनाया है। हरोपुरा के नंजनगुड तालुक में बने सरकारी हायर प्राइमरी स्कूल के टीचर्स ने अपने स्कूल को एक अदभुत नज़ारे में बदल दिया है। यह स्कूल अब ट्रेन की तरह दिखता है, जिसके पीछे असिस्टेंट टीचर दोरेस्वामी का आइडिया है और इस पेंटिंग के लिए सभी टीचर्स ने अपनी जेब से 25 हज़ार रुपये लगाए हैं। इस कोशिश का असर यह हुआ है कि इंग्लिश प्राइवेट स्कूल में पढ़ने वाले दो बच्चों ने यहां दाखिला ले लिया है।

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कैप्शनः स्कूल बने रेल के डिब्बे  | इमेज: हिंदुस्तान टाइम्स

अलवर, राजस्थान

कुछ इसी तरह का कदम अलवर के सीनियर सेकेंडरी स्कूल, रेलवे स्टेशन के टीचर्स ने उठाया है। यहां कक्षाओं को यात्रियों के डिब्बों की तरह चित्रित किया गया है, प्रिंसिपल का कार्यालय एक इंजन की तरह दिखता है और बरामदा प्लेटफॉर्म है, जहां छात्र घूमते हैं। स्कूल के प्रिंसीपल की माने तो, ‘बच्चे हमेशा ट्रेन से आकर्षित होते हैं और उनमें यात्रा करना उनके लिए आनंदमय होता है।सरकारी स्कूल की इमारतों को आकर्षक बनने की ज़रूरत है, जिससे छात्रों में गर्व की भावना पैदा हो सके।

बच्चों को स्कूल की ओर आकर्षित करने के लिए ऐसे ही विकल्पों की ज़रूरत है, क्योंकि बच्चे पढ़ेंगे तभी तो आगे बढ़ेंगे।

इमेज: यूट्यूब

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