चेहरा गया लेकिन हिम्मत और हौसले नहीं, यह है मन की खूबसूरती

प्रेरणा और हौसलों से बुलंद है जीवन की कहानी
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व्यक्ति एक बार भी नहीं सोच पाते कि जो काम वे कर रहे हैं, उससे पीड़ित व्यक्ति की ज़िंदगी मौत  से भी बदतर हो जाएगी। इसके बावजूद पीड़ित लड़कियों ने अपने जख्मों से लड़कर आज भी अच्छी ज़िंदगी जीने की कोशिश कर रहे है, जो वाकई में हमारे समाज के लिए एक मिसाल है।

कुछ ऐसे एसिड अटैक पीड़ित जुड़े लोगों से अवगत कराते है, जिन्होंने अपने जज़्बे और हिम्मत से इस बात को और प्रभावशाली बना दिया है कि यदि व्यक्ति में जीवन जीने की चाह और कुछ कर गुज़रने का जूनून हो, तो फिर वह असंभव को संभव कर सकती है।

लक्ष्मी अग्रवाल

चेहरा गया लेकिन हिम्मत और हौसले नहीं, यह है मन की खूबसूरती
जीना है अपने लिये |इमेज : फेसबुक

लक्ष्मी हौसले की अनोखी मिसाल है। उनके दोस्त के 32 साल के भाई ने उनके ऊपर सिर्फ इसलिए एसिड से हमला कर दिया था क्योंकि लक्ष्मी ने उसके शादी के प्रपोजल को ठुकरा दिया था। उस समय वह सिर्फ 15 साल की थी। एसिड अटैक होने के बाद भी वह अपने बूते पर खड़ी हुई। उस पीड़ा और शॉक को भुला पाना तो बेशक असंभव था, लेकिन फिर भी उन्होंने सब कुछ एक नए सिरे से शुरू किया। एसिड अटैक के खिलाफ़ सबसे बुलंद आवाज़ उठाई। आज अपनी जैसी लड़कियों को मेडिकल हेल्प देना और उन्हें समाज से जोड़े रखने के लिये उन्होंने छांव फाउंडेशन की स्थापना की।  

रेशमा कुरैशी

चेहरा गया लेकिन हिम्मत और हौसले नहीं, यह है मन की खूबसूरती
जीना है अपने लिये |इमेज : फेसबुक

रेशमा कुरैशी का अतीत जितना दर्दनाक और खौफनाक है, वर्तमान उतना ही प्रेरणादायी। एसिड अटैक का शिकार बनी इस युवती का चेहरा खराब हो गया। एक आंख की रोशनी जाती रही, लेकिन आज उसने सुंदरता की एक नई परिभाषा कायम की है। रेशमा के चेहरे पर उसके ही जीजा ने तेजाब फेंक दिया था। इस घटना ने रेशमा के जीवन में बवंडर मचा दिया। इस घटना से रेशमा ने गहरी चुप्पी साध ली, लेकिन जिंदगी को खूबसूरत ढंग से जीने की इच्छा जागृत कर वह परिस्थितियों से लड़ीं और एसिड अटैक पीडि़ताओं की प्रेरक बन गईं। तेजाब से चेहरा खराब होने के बावजूद रेशमा ने फैशन की दुनिया में कदम रखा। न्यूयॉर्क फैशन वीक में रैंप पर कैटवॉक कर लोगों का दिल जीत लिया। साथ ही यह संदेश दिया कि रंग रूप ही असली खूबसूरती नहीं। उनकी इसी हिम्मत पर ‘बीइंग रेशमा’ नाम की किताब भी लिखी गई है।

शब्बो शेख 

चेहरा गया लेकिन हिम्मत और हौसले नहीं, यह है मन की खूबसूरती
जीना है अपने लिये |इमेज : फेसबुक

शब्बो के साथ जो हुआ उसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। जिसने एसिड का नाम भी नहीं सुना था। शब्बो दो साल की थी, जब उनके पिता ने गुस्से में उनकी मां पर एसिड डाल दिया था। उस वक़्त मां की गोद में शब्बो बैठी थी, इस वजह से आधा एसिड शब्बो पर गिरा। उस अटैक में शब्बो ने अपनी मां को खो दिया और उस हालत में रिश्तेदारों ने भी उसे अपनाया से मना कर दिया। अपनी आगे के जीवन को शब्बो ने एक अनाथालय में बिताया। अपने जीवन में बार-बार पुरानी बातों को याद करने से खुद को ही तकलीफ नहीं देना चाहती थी, इसलिये ज़िंदगी से नफरत को हटा दिया। शब्बो कहती है कि उसने मेरे शरीर को झुलसाया है लेकिन मेरी आत्मा अभी जीवित है। इस युवा लड़की के शब्दों से उसके इरादों की मजबूती झलकती है।

एक ऐसी जगह जहां एसिड अटैक से जुड़ी महिलाओं को नई शुरूआत करने का मौका मिलता है।
शीरोज हैंगआउट
चेहरा गया लेकिन हिम्मत और हौसले नहीं, यह है मन की खूबसूरती
जीना है अपने लिये |इमेज : फेसबुक

‘शीरोज हैंगआउट’ एक ऐसी जगह है, जो प्रेरणा है मानवता की, उम्मीद है ज़िंदगी की, अहसास है तमाम मुश्किलों के बाद भी कुछ करने का, हौसला है परिस्थितियों से लगातार लड़कर उबरने का, चाहत है खुद को फिर से संवारने की और एक हिम्मत है ऐसे जाबांज महिलाओं के पुर्नवास का जो एसिड अटैक की शिकार हैं। ये खाने पीने की ऐसी जगह है जिसको एसिड अटैक की शिकार ऋतु, रूपाली, डोली, नीतू और गीता नाम की पांच महिलाएं चला रही हैं। ‘शीरोज हैंगआउट’ में ना सिर्फ खाने पीने का लुत्फ उठाया जा सकता है, बल्कि कोई चाहे तो वो एसिड अटैक की शिकार रूपाली के डिजाइन किये कपड़े भी खरीद सकता है।

शीरोज हैंगआउट को शुरू करने का मुख्य उद्देश्य एसिड अटैक से पीड़ित लड़कियों का पुर्नवास करना था। यहां पर इस बात का ज़्यादा ध्यान दिया जाता है कि कैसे एसिड पीड़ितों की ज़्यादा से ज़्यादा मदद की जा सके।

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