इंकार से लेकर स्वीकृति तक दुख के होते हैं 5 चरण

जब आप गहरे दुख को स्वीकार कर लेते हैं तो दर्द खत्म तो नहीं होता, मगर आप बदले हालात के साथ जीना सीख जाते हैं
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अपने किसी प्रियजन या बेहद करीबी इंसान को खोने का दुख बहुत गहरा होता है। किसी अपने की जाने की खबर मिलते ही इंसान भावनाओं के सागर में डूब जाता है, पहले तो वह इस सच को स्वीकर नहीं कर पाता और फिर दर्द को बहुत गहराई से महसूस करता है। उसे जाने वाले की हर एक बात याद आने लगती है और भावुकता बढ़ती जाती है, भावनाओं के कई उतार-चढ़ाव के बाद आखिरकार वह सच को स्वीकार करता है और तब उसकी ज़िंदगी वापस पटरी पर आने लगती है। इस तरह से दुख या शोक के कई चरण होते हैं। मशहूर मनोवैज्ञानिक एलिज़ाबेथ कुबलर रॉस ने इसके 5 स्टेज/चरण बताए हैं।

इंकार

जब आपको किसी अपने की इस दुनिया से जाने की खबर मिलती है, तो आपकी पहली प्रतिक्रिया होती है ‘ऐसा नहीं हो सकता’ ‘यह सच नहीं हो सकता’ ‘आप/तुम मुझे छोड़कर नहीं जा सकते’… यानी हम सच्चाई को स्वीकार नहीं कर पातें। यह इंकार कुछ देर के लिए ही सही आपको दुख की गहराई में जाने से रोके रखता है। किसी अपने को खोने की बात पर विश्वास करना वाकई बहुत मुश्किल होता है। आपके दिमाग में उस शख्स से जुड़ी बातें और यादें घूमने लगती हैं और आप सोचते हैं कि उसके बिना आप ज़िंदगी कैसे बिताएंगे। इस प्रक्रिया में दिमाग को नई सच्चाई के साथ सामंजस्य स्थापित करने का समय मिल जाता है। इस प्रक्रिया में आप न सिर्फ सच को अस्वीकार करते हैं, बल्कि जो हो रहा है उसे समझने की कोशिश भी करते हैं।

गुस्सा

किसी अपने को खोने के बाद गुस्सा आना लाज़िमी ही है। कभी आप भग्वान को कोसते होंगे कि आखिर क्यों उसने आपसे किसी प्रियजन को छीन लिया, तो कभी हालात पर गुस्सा आता होगा। इस दौरान आप नई सच्चाई के साथ सामंजस्य स्थापित करने की कोशिश करते हैं और भावनात्मक रूप से अत्यधिक असहज महसूस करते हैं। दरअसल, क्रोध के रूप में हमारे मन की भावनाएं बाहर आती हैं। किसी के अचानक चले जाने का दुख जब बर्दाश्त नहीं होता है तो भावनाएं गुस्सा बनकर निकलती हैं। इस दौरान आप अकेला महसूस करते हैं और किसी के द्वारा दिलासा देने पर थोड़ा अच्छा महसूस कर सकते हैं।

बातचीत

किसी की मौत की खबर को जब आप स्वीकार नहीं कर पाते तो, आपके मन में ढेरों विचार आने लगते हैं कि किस तरह से आप उस अपने को जाने से रोक लें या उसे वापस ले आएं, जो कि वास्तव में संभव नहीं होता है। ‘हे भगवान, यदि आप उसे वापस भेज देंगे तो मैं कभी गुस्सा नहीं करूंगा’, ‘यदि आप उसे मुझसे नहीं छीनें तो अपनी सारी बुरी आदतें छोड़ दूंगा’… इस तरह की कई बातें आप अपने आप से करने लगते हैं, जो एक तरह से खुद को झूठा दिलासा देना है, लेकिन इस दौरान हम अपनी गलतियों के बारे में बात करते हैं और पछताते हैं।

स्वीकृत
सच को स्वीकार करने से दर्द कम होता है | इमेज : फाइल इमेज

डिप्रेशन

जब आप इनकार की अवस्था से आगे बढ़ जाते हैं यानी जब सच को महसूस करने लगते हैं और समझ जाते हैं कि भग्वान से बातें करके भी कुछ नहीं बदलेगा, तो आप समझ नहीं पाते कि किसी अपने को खोने के बाद कैसे रहें। उस शख्स के बिना जीने की कल्पना भर से आप डिप्रेशन में चले जाते हैं। दुख इतना गहराई से महसूस होता है कि आप बिल्कुल अकेले रहते हैं, किसी से मिलना और बातें करने का मन नहीं होता। हालांकि इस अवस्था से चलती निकलना ज़रूरी है, वरना डिप्रेशन आप पर हावी हो सकता है।

स्वीकृति

ऐसा नहीं है कि इस अवस्था में दर्द और उदासी नहीं रह जाती, लेकिन अब आप सच को स्वीकार कर लेते हैं और यह मान लेते हैं कि इसे बदला नहीं जा सकता। इस तरह से आप वर्तमान हालात के साथ समझौता करके जीवन जीने लगते हैं। दुख और दर्द को अपने अंदर दफन कर देते हैं, क्योंकि आप समझ जाते हैं कि जो हुआ उसे बदला नहीं जा सकता।

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