किसी मिसाल से कम नहीं है पर्यावरण के प्रति प्रेम दर्शाते ये गांव

कुदरत को सहेजते गांव जो सिखा रहे हैं पर्यावरण से प्यार करना
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प्रकृति ने हमें सांस लेने के लिए शुद्ध हवा दी, पीने का पानी दिया और ढेर सारे हरे-भरे पेड़ भी, लेकिन विकास की होड़ में प्रकृति का इतना दोहन हुआ कि पर्यावरण का संतुलन ही बिगड़ गया है। यदि हम अपने बच्चों को शुद्ध हवा और पानी देना चाहते हैं तो हमें अभी से पर्यावरण को बचाना होगा जैसा कि हमारे देश के कई गांव कर रहे हैं। बिना किसी तरह की सरकारी मदद के कई गावों ने पर्यावरण को बचाने के लिए ऐसा अनोखा काम किया है जो किसी नज़ीर से कम नहीं है और यह पर्यावरण के प्रति उनके प्यार को दर्शाता है। आइए, जानते हैं ऐसे ही कुछ गांवों के बारे में।

कदबनवाड़ी

कदबनवाड़ी
गांव में पानी की समस्या हुई दूर | इमेज : ट्विटर

महाराष्ट्र के पुणे जिले के इस छोटे से गांव में कभी पानी की बहुत कमी थी। चारों तरफ से जंगल से घिरे होने के बावजूद यहां बारिश बहुत कम होती थी, जिसके कारण गांववाले हमेशा पानी के लिए तरसते रहते थे। ऐसे में एक रिटायर साइंस टीचर ने अपनी मेहनत और लोगों को एकजुट करके गांव की तकदीर ही बदल दी। साइंस टीचर भजनदास पवार ने कुछ पर्यावरणविदों और गांववालों के साथ मिलकर पास के जंगल को ऑक्सीजन पार्क में बदल दिया। यानी वहां ऐसे पौधे लगाएं जो अधिक ऑक्सीजन छोड़ते हैं, गांववालों ने पीपल, इमली, जामुन, बरगद आदि के करीब 700 पौधे लगाएं और उनकी देखभाल की। जंगल की देखभाल के लिए गांववालों ने खुद ही मिलकर पैसे जुटाएं। इस पहल का परिणाम यह हुआ की कुछ सालों बाद पानी की कमी की समस्या दूर हो गई और जलवायु परिवर्तन से निपटने के मामले में यह गांव अब एक मिसाल बन चुका है।

मावलिननॉन्ग

मावलिननॉन्ग
एशिया का सबसे साफ-सुथरा गांव | इमेज : फेसबुक

आपने इस गांव का नाम तो ज़रूर सुना होगा। साल 2003 में इसे एशिया का सबसे साफ-सुथरा गांव होने का दर्जा मिला था। प्राकृतिक सुंदरता से सराबोर मेघालय के इस गांव को लोगों ने साफ-सुथरा और सुव्यवस्थित बनाकर यह साबित कर दिया है कि यदि दिल से कोशिश की जाए तो कुछ भी नामुमकिन नहीं है। बिना किसी बाहरी मदद के ही गांववालों ने अपने गांव को स्वच्छ बनाया है। यहां जगह-जगह बांच के कूड़ेदान बने हैं। कचरे को जमाकर करके उससे खाद बनाई जाती है। इस गांव में प्लास्टिक पर पूरी तरह से बैन है। इसके अलावा धूम्रपान पर भी प्रतिबंध है ताकि हवा प्रदूषित न हो। किचन के कचरे से भी यहां खाद बनाई जाती है। यह गांव सैलानियों के बीच बहुत लोकप्रिय है। कभी फुर्सत हो तो आप भी मावलिननॉन्ग की सैर अवश्य कर आइएगा।

रामचंद्रपुर

रामचंद्रपुर
पेड़-पौधे लगाकर गांव का वातावरण हुआ शुद्ध | इेमज : फेसबुक

तेलंगाना का यह गांव भी किसी मिसाल से कम नहीं है। 2004-05 में इसे निर्मल पुरस्कार मिल चुका है। कभी सफाई यहां की बहुत बड़ी समस्या हुआ करती थी, लेकिन गांववालों ने मिलकर इसे दूर कर दिया। अब हर घर में शौचालय है और धुंआ रहित चूल्हे हैं जिससे वायु प्रदूषण नहीं होता है। इतना ही नहीं पानी की बर्बादी रोकने के लिए इन्होंने ऐसी व्यवस्था कर रखी है कि हर घर से निकलने वाला पानी पेड़-पौधों में जाता है। गांव के हर घर में ढेर सारे पेड़-पौधे लगे हुए हैं ताकि वातावरण शुद्ध रहे। इतना ही नहीं यह राज्य का पहला गांव हैं जहां गांववालों मे नेत्रदान की शपथ ली है।

इन गांवों की तरह यदि भारत का हर गांव व शहर भी पर्यावरण को ध्यान में रखकर चले तो ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याओं से कुछ हद तक निपटा जा सकता है।

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