मेडिटेशन से पाएं डर पर जीत

बीते और आने वाले कल की चिंता से पैदा होता है डर
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डर एक स्वाभाविक मनोवैज्ञानिक भावना हैं जिसका अनुभव हर कोई कभी न कभी करता है, जैसे किसी को अंधेरे से डर लगता है तो किसी को ऊंचाई से, कोई लोगों के बीच बोलने से डरता है तो कोई घर में अकेले रहने से… लेकिन जब यह डर किसी व्यक्ति पर हावी हो जाता है तो समस्या बढ़ जाती है। यह डर तब फोबिया का रूप धारण कर लेता है और व्यक्ति के विकास में बाधक बन जाता है। इसलिए समय रहते डर पर काबू पाना ज़रूरी है, डर पर काबू पाने या इससे उबरने का एक आसान और कारगर उपाय है रोज़ाना मेडिटेशन करना।

डर क्या है?

यह एक नकारात्मक मनोवैज्ञानिक भावना है। कई बार तो यह सिर्फ कल्पना में ही होता है असल में इसका अस्तित्व ही नहीं होता। व्यक्ति बस यह सोचकर ही डर जाता है कि अरे यह काम नहीं किया तो बॉस से डांट पड़ेगी, जबकि अगले दिन ऐसा कुछ होता ही नहीं है। हर व्यक्ति का डर अलग-अलग होता है। थोड़ा बहुत डर होना तो अच्छा है, मगर इसे खुद पर हावी न होने दें। जैसे कुछ गलत काम करने पर बच्चों में यह डर होना की माता-पिता डांटेंगे यह अच्छी बात है, लेकिन जब डांट या मार का डर हावी हो जाए तब समस्या खड़ी हो जाती है।

इससे उबरने में कैसे मदद करता है मेडिटेशन?

किसी व्यक्ति में डर का कारण आमतौर पर बीते कल का कोई बुरा अनुभव होता है या फिर आने वाले कल को लेकर चिंता। जैसे बचपन में यदि किसी बच्चे को सजा के दौर पर अंधेरे कमरे में बार-बार बंद किया जाता रहा हो, तो बड़े होने पर उसे किसी भी बंद जगह या अंधेरे से डर लगने लगेगा। इसी तरह कल क्या होगा इसकी अधिक चिंता करना भी डर की वजह हो सकता है। इसलिए रोज़ाना ध्यान करना ज़रूरी है, क्योंकि जब आप मेडिटेशन करते हैं तो मन से सारे नेगेटिव विचार निकल जाते हैं और आपका पूरा फोकस सिर्फ वर्तमान पर होता है यानी आप मौजूदा पल को जीते हैं। जब आप बीते और आने वाले कल के बारे में सोचेंगे ही नहीं, तो उनसे डर उपजने का सवाल ही नहीं है। मेडिटेशन आपके दिमाग को वर्तमान पल में जीना सिखाता है, जिससे आपको नकारात्मक विचारों के चक्र से मुक्ति मिल जाएगी।

कैसे करें शुरुआत?

डर और चिंता से उबरने के लिए माइंडफुलनेस मेडिटेशन बहुत कारगर माना जाता है। यदि आपकी शुरुआत है, तो इस तरह माइंडफुलनेस मेडिटेशन कर सकते हैं

  • किसी शांत जगह पर बैठ जाएं, जहां कोई आपको परेशान न करें।
  • आप ज़मीन पर या कुर्सी पर जहां भी सहज महसूस करें, पीठ सीधी रखकर बैठ जाएं।
  • 5 मिनट का टाइमर सेट कर सकते हैं और फिर रिलैक्स होकर आंखें बंद कर लें। गहरी सांस लें, नाक से सांस लें और नाक या मुंह से छोड़ सकते हैं, जो भी आपको सहज लगे। सांस को पूरे पेट में नीचे की ओर महसूस करें।
  • सांस लेने और छोड़ते समय जो आवाज़ आती है, उस पर फोकस करें। जब आप सांस लेते हैं तो अपने आसपास की शांत और खूबसूरत चीज़ों को महसूस करें और सांस छोड़ते समय तनाव और नकारात्मकता को शरीर व मन से बाहर निकालें। लयबद्ध तरीके से सांस लेकर और छोड़कर दिमाग को शांत करें।
  • यदि मन भटक जाएं तो परेशान न हों, दोबारा सांसों पर फोकस करने की कोशिश करें। आपको क्या सुनाई देता है? आप क्या महसूस कर रहे हैं? कोशिश करें कि बीते और आने वाले कल के बारे में सोचना छोड़कर मौजूदा क्षण को महसूस करें।

इसका अभ्यास रोज़ाना करें, धीरे-धीरे आपको आदत हो जाएगी। जिस तरह कसरत के लिए रोज़ाना अभ्यास ज़रूरी है वैसे ही मेडिटेशन मानसिक कसरत है और इसके लिए भी अभ्यास करना ज़रूरी है। रोज़ाना कम से कम 5-10 मिनट का समय इसके लिए ज़रूर निकालें। कुछ ही हफ्तों में आपको अपने अंदर बदलाव महसूस होगा।

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